शिव की खोज
(खोज - वैराग्य - विलय)
खोज
(मैं कौन हूँ?)
भूल गए हम दुनिया को, बस शिव की धुन में।
कहाँ ढूँढें उन्हें, जब वे बसते हैं हर मन में।
शिव की खोज किसी मंदिर से नहीं, एक प्रश्न से आरम्भ हुई-मैं कौन हूँ?
मैंने जीवन की अनेक राहें देखीं, कई दौरों से गुज़री। समय बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, पर यह प्रश्न भीतर निरंतर गूंजता रहा।
शुरुआत में लगा कि शिव बाहर होंगे-कैलास की ऊँचाइयों में, मंदिरों की शांति में, मूर्तियों की स्थिरता में। पर जैसे-जैसे भीतर उतरी, बाहरी संसार छूटता चला गया। तब समझ आया-यह खोज बाहरी नहीं, यह स्वयं को स्मरण करने की यात्रा है।
धीरे-धीरे यह बोध हुआ कि कर्ता चाहे जितना प्रयत्न कर ले, सब कुछ उसके वश में नहीं। कर्ता करे न कर सकै, शिव करै सो होय। तीन लोक और नौ खंडों के पार भी महाकाल से बड़ा कोई नहीं।
यहीं मन ने स्वीकार किया-
“भस्म से होता जिनका श्रृंगार, मैं उसी महाकाल का पुजारी हूँ।”
खोज चलती रही, क्योंकि शिव हर जगह हैं-कण-कण में बसे हैं। इसलिए खोज भी एक निरंतर प्रक्रिया बन गई।
वैराग्य
(छूटना, टूटना और मुक्त होना)
“खोज तब तक आसान लगती है, जब तक छोड़ना न पड़े और शिव की राह में सबसे पहले ‘मैं’ छूटती है।”
मैंने ज़िंदगी से कहा-तुझे पाना नहीं चाहती, तुझे समझना चाहती हूँ। गिरना तय था, पर हर गिरावट किसी अंत की नहीं, किसी द्वार के खुलने की सूचना थी।
जो बेड़ियाँ मुझे जकड़े थीं, मैंने उन्हें गहना समझना छोड़ दिया। जब उन्हें पिघलाया, तब जाना-वही बेड़ियाँ शस्त्र भी बन सकती हैं। उसी क्षण शिव का पहला स्पष्ट स्वरूप प्रकट हुआ-वैराग्य।
यहीं भक्ति ने प्रेम का रूप लिया। यह खोज सांसारिक नहीं रही, यह आध्यात्मिक प्रेम और समर्पण से भर गई। भीतर से स्वर उठा-
“हर हर महादेव का नारा है, शिव ही तो सहारा है।”
अहंकार ने परीक्षा ली-मैं, मेरा, मुझे। मैं थकी, टूटी, डगमगाई। और तभी मुझे मिला मौन न उपदेश, न शब्द। उसी मौन में शिव प्रकट हुए, अनुभूति बनकर।
विलय
(जहाँ ‘मैं’ समाप्त होती है)
“एक क्षण ऐसा आया, जब न खोज बाकी रही… न खोजने वाला।”
फिर शिव केवल आराध्य नहीं रहे, वे तत्व बन गए। शिव सत्य हैं, अनंत हैं, अनादि हैं। शिव ओंकार हैं, ब्रह्म हैं, शक्ति हैं और भक्ति भी। शिव ही वह शून्यता हैं, जो सबमें जन्म लेती है और फिर सबमें विलीन हो जाती है।
तब समझ आया शिव वह नहीं जिन्हें देखा जाए, शिव वह हैं जिन्हें हो जाया जाए।
ना पूछो मुझसे मेरी पहचान, मैं तो भस्मधारी हूँ, मन की गहराई में बसने वाली।
जैसे-जैसे “मैं” मिटती गई, शिव और अधिक स्पष्ट होते गए। मेरे संघर्ष में भी वही थे, मेरे मौन में भी और मेरे तांडव में भी।
फिर एक क्षण आया-जहाँ न खोजने वाली रही, न खोजा जाने वाला अलग। न भक्तिनी थी, न भगवान। वहाँ केवल शिव था।
अब भी खोज जारी है, पर अब वह भटकन नहीं स्थिरता है। हर श्वास में ॐ नमः शिवाय है और हर मौन में महादेव।
और वही अंतिम सत्य-शिव है।
