माथे पर तिलक
एक मौन विज्ञान, जो सदियों से मानव चेतना को जागृत करता आया है
क्या आपने कभी सोचा है…
हर पूजा, हर यज्ञ, हर विवाह और हर शुभ कार्य से पहले
माथे पर तिलक क्यों लगाया जाता है?
क्या यह केवल एक परंपरा है?
या इसके पीछे कोई ऐसा रहस्य छिपा है,
जिसे हमारे ऋषियों ने हज़ारों वर्ष पहले समझ लिया था?
हिंदू परंपरा में तिलक लगाने की क्रिया कोई साधारण रस्म नहीं है।
यह मानव चेतना को जागृत करने की एक वैज्ञानिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है।
तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है
दोनों भौंहों के बीच का यह सूक्ष्म बिंदु
योग विज्ञान में आज्ञा चक्र कहलाता है।
यही वह स्थान है जिसे Third Eye कहा जाता है
मन और आत्मा का नियंत्रण केंद्र।
जब उँगलियों से इस बिंदु को स्पर्श किया जाता है,
तो मस्तिष्क की सूक्ष्म नसों पर हल्का दबाव पड़ता है।
यह दबाव
- मन को शांत करता है
- विचारों की गति को धीमा करता है
- और व्यक्ति को बाहरी संसार से हटाकरभीतर की यात्रा पर ले जाता है
इसीलिए हमारे शास्त्र कहते हैं
“पूजा से पहले तिलक अनिवार्य है।”
लेकिन तिलक केवल स्थान का विषय नहीं है
उसमें प्रयुक्त पदार्थ भी गहरे अर्थ रखते हैं।
- चंदन – मन की अग्नि को शांत करता है
- कुमकुम / रोली – रक्त प्रवाह और सकारात्मक ऊर्जा को सक्रिय करता है
- भस्म – देह की नश्वरता का स्मरण कराती है और अहंकार को भस्म कर देती है
भस्म का तिलक कहता है
“संस्थान नहीं, ईश्वर शाश्वत है।
हर पल मृत्यु को याद रखो और अहंकार छोड़ो।”
आपने देखा होगा
तिलक भी अलग-अलग प्रकार के होते हैं।
वैष्णव उर्ध्व तिलक
सीधा ऊपर की ओर जाता हुआ तिलक
यह संकेत है कि
जीवन की सारी ऊर्जा ईश्वर की ओर प्रवाहित हो।
शैव भस्म तिलक
यह कोई सजावट नहीं
यह एक घोषणा (Declaration) है।
यह कहता है
“अब मेरा मन, मेरी ऊर्जा और मेरा कर्म
पूर्णतः ईश्वर को समर्पित है।”
लंबा तिलक केवल आकार नहीं दर्शाता
यह ऊर्जा की यात्रा का संकेत है
मूलाधार से लेकर सहस्रार तक।
यह शिव का निशान नहीं
यह शिवत्व की स्वीकृति है।
धर्मग्रंथों के अनुसार
माथे के मध्य भाग में
भगवान विष्णु का निवास माना गया है।
यही स्थान मन के गुरु का भी है।
इसलिए यहाँ तिलक लगाने से
- एकाग्रता बढ़ती है
- तेज और ओज में वृद्धि होती है
- और व्यक्ति मानसिक रूप से अधिक स्थिर होता है
हमारे शरीर में कई ऊर्जा केंद्र होते हैं
जिन्हें चक्र कहा जाता है।
इनमें आज्ञा चक्र सबसे महत्वपूर्ण है।
यहीं तीन प्रमुख नाड़ियाँ मिलती हैं
इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना।
तिलक इस संगम को सक्रिय करता है।
यहाँ तक कि तिलक लगाने की उँगली भी महत्व रखती है
- अनामिका उँगली से तिलक → मन को शांति
- मध्यमा उँगली से तिलक → आयु और स्थिरता
- अंगूठे से तिलक → स्वास्थ्य और ऊर्जा संतुलन
जब तिलक लगाया जाता है,
तो व्यक्ति का मस्तिष्क स्वतः सजग हो जाता है।
अहंकार झुकता है।
मन में एक भाव जागता है
समर्पण… शांति… और श्रद्धा।
शायद इसलिए तिलक लगाते समय
आँखें अपने-आप क्षण भर को झुक जाती हैं।
यह झुकाव शरीर का नहीं
आत्मा का झुकाव है।
और जो लोग कहते हैं
“तिलक न लगाने से क्या होता है?”
तो उत्तर सीधा है
तिलक कोई दंड नहीं,
लेकिन यह एक सुरक्षा कवच अवश्य है।
यह नकारात्मक विचारों,
मानसिक विचलन
और अशांत ऊर्जा से रक्षा करता है।
इसी कारण
ऋषि, मुनि, साधु और राजा
सदैव तिलक धारण करते थे।
इसलिए अगली बार
जब आप माथे पर तिलक लगाएँ
तो उसे केवल परंपरा न समझें।
समझिए कि
आप अपने भीतर छिपी उस चेतना को स्पर्श कर रहे हैं
जिसे हमारे ऋषियों ने
हज़ारों वर्ष पहले पहचान लिया था।
तिलक – एक बिंदु नहीं,
बल्कि आत्मा और ब्रह्मांड के बीच का सेतु है।
