प्रेम - माया - भक्ति: चेतना की पूर्ण यात्रा - एक अनंत आरोहण
कवि रहीम का यह दोहा जीवन की सूक्ष्म गहराइयों में उतरकर एक शाश्वत सत्य उजागर करता है:
“रूप, कथा, पद, चारु पट, कंचन, दोहा, लाल- ज्यों-ज्यों
निरखत सूक्ष्म गति, मोल रहीम बिसाल॥”
अर्थात, जैसे-जैसे हम किसी वस्तु, भाव या संबंध की आंतरिक गहराई को स्पर्श करते हैं, उसका मूल्य अनंत हो जाता है। बाहरी चमक आकर्षित करती है, किंतु भीतरी अमृत ही उसे अमर बनाता है। यही सिद्धांत प्रेम पर लागू होता है जो न केवल श्रृंगार है, बल्कि एक आरोहण है, जहाँ आकर्षण भक्ति की ऊँचाइयों तक पहुँचता है।
क्या प्रेम केवल देह का खेल है? या मन की उथल-पुथल? नहीं, प्रेम, माया और भक्ति एक ही चेतना की क्रमिक अवस्थाएँ हैं शरीर से आत्मा तक की यात्रा, जैसे नदी का स्रोत से सागर तक विलीन होना। वेदांत में इसे “माया से मोक्ष” की यात्रा कहा गया है, जहाँ अविद्या (माया) ज्ञान (भक्ति) में रूपांतरित होती है।
शरीर के स्तर पर: माया - मरीचिका का जाल
माया इंद्रियों का भ्रम है, अहंकार की छाया। यह आकर्षण है, जो “पाने” की प्यास जगाती है, “होने” की नहीं। जैसे रेगिस्तान की मरीचिका दूर से जल प्रतीत होती है, किंतु निकट जाकर वाष्प बन जाती है। माया सत्य नहीं, प्रतीति है जो क्षणिक सुख देती है, पर स्थायी पीड़ा छोड़ जाती है।
भगवद्गीता में कृष्ण कहते हैं: “माया दुरत्यया” (माया को पार करना कठिन है)। माया बुरी नहीं, अपूर्ण है। यह जीवन की पहली सीढ़ी है, जो हमें अनुभव सिखाती है, किंतु यदि यहीं रुक गए, तो दुख अनिवार्य है। आधुनिक मनोविज्ञान में इसे “डोपामाइन का लूप” कहते हैं आकर्षण का चक्र जो कभी तृप्त नहीं करता।
मन के स्तर पर: प्रेम - संवेदना का पुल
जब माया में संवेदना का स्पर्श जुड़ता है, तब प्रेम अवतरित होता है। प्रेम मन से जन्म लेता है, देह से गुजरता है, और यदि शुद्ध हो, तो आत्मा की ओर उन्मुख होता है। सच्चा प्रेम आकर्षण रखता है, किंतु अधिकार नहीं; चाह रखता है, किंतु स्वार्थ नहीं।
यहाँ पीड़ा आती है, जैसे लौ की जलन जो रोशनी भी देती है। यदि प्रेम केवल सुख तक सीमित रहा, तो वह माया में गिर जाता है। किंतु जब त्याग, करुणा और समर्पण जुड़ते हैं, तब प्रेम आरोहण करता है। तुलसीदास कहते हैं: “प्रेम भगति जलु बिनु रघुराई, अभि अंतर की जाय न जाई॥” (प्रेम रूपी जल बिना, हृदय की प्यास नहीं बुझती)। प्रेम द्वंद्व है सुख-दुख का संतुलन, जो हमें भक्ति की ओर ले जाता है।
क्या आपने कभी किसी से प्रेम किया है जहाँ “मैं” से अधिक “तुम” महत्वपूर्ण हो गया? यही प्रेम की सच्ची परीक्षा है।
आत्मा के स्तर पर: भक्ति – विलय का आनंद
प्रेम का परिपक्व रूप भक्ति है आत्मा और परमात्मा का अटूट मिलन। यहाँ “मैं” विलीन हो जाता है, केवल “वह” शेष रहता है। भक्ति निस्वार्थ है, जैसे सूरज की किरणें जो बिना अपेक्षा चमकती हैं।
मीरा की दीवानगी देह से नहीं, ईश्वर से संवाद थी। कबीर कहते हैं: “प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाई॥” (प्रेम की गली इतनी संकरी है कि दो न समाते अर्थात अहंकार का त्याग आवश्यक)। शबरी के जूठे बेर राम ने ग्रहण किए, क्योंकि भक्ति में भेदभाव नहीं भगवान भक्त बन जाता है, भक्त भगवान।
भक्ति का अनुभव:
– जो आँखों से आँसू बन बह जाए, हृदय में हर श्वास के साथ गहराती जाए।
– जो बिना दर्शन के वर्णन कर दे, बिना स्पर्श के महसूस हो जाए।
– जो कबीर को अमर बना दे, तुलसी को तुलसीदास और भक्त को भगवान।
निष्कर्ष: यात्रा की पूर्णता – साधना का सार
माया को नकारें नहीं, प्रेम को रोके नहीं उन्हें समझें और भक्ति तक ले जाएँ। यह जीवन की सच्ची साधना है: देह से आरंभ, मन से गुजरकर, आत्मा में विलीन होना। जैसे बीज से वृक्ष, फूल से फल।
क्या आप तैयार हैं इस यात्रा के लिए? क्योंकि भक्ति न केवल मुक्ति देती है, बल्कि जीवन को अनंत अर्थ। याद रखें, रहीम का दोहा सिर्फ शब्द नहीं एक निमंत्रण है, चेतना की पूर्णता की ओर।
